हिन्दू विवाह अधिनियम संशोधन 2010 /Hindu marriage act 2010 amendment

शब्दकोष के संशोधन का अर्थ कुछ इस तरह से दिया गया है :
संशोधन: शुद्धिकरण , गल्ती को सुधारना ,पहले बनी वास्तु के दोष को मिटाना .
हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन के लिए बिल हमारी संसद में लंबित है और शायद मानसून सत्र में इस पर एक बार फिर चर्चा हो यो शायद बिना चर्चा के ही इसे लागू कर दिया जाए . हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 में संशोधन करने के बाद इसमें तलाक के लिए एक  नयी धारा जोड़ने का प्रस्ताव है . इस धारा को नाम दिया गया है : Irretrievable Breakdown of Marriage यानी शादी चलने के काबिल नहीं रह गयी है .

आज तक तलाक लेते समय इस धारा के अंतर तलाक देने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के पास था , जिला या उच्च न्यायलय के पास इस धारा के अंतर्गत तलाक देने का प्रावधान नहीं था . गत वर्षों में इस धारा को तलाक का आधार बनाने का समर्थन किया जाता रहा है

http://lawcommissionofindia.nic.in/51-100/Report59.pdf

1977 में आये इस प्रस्ताव को 2010  तक लागू  करने की कोई कोशिश नहीं की गयी और 2010  में इस को जिस रूप में लागू करने की कोशिश हो रही है उसने कई लोगों को सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या  इस से समाज का भला होगा ?

इस में कोई शक नहीं है कि कई देशों में ऐसा कानून लागू है  जैसे ऑस्ट्रेलिया, newzealand , कनाडा, अमेरिका . newyork में यह पिछले साल ही लागू हुआ है और अधिकाँश european देशों में अभी भी इस धारा के अंतर्गत तलाक नहीं मिलता .

इस प्रस्ताव के पक्ष में ऐसा कहा जाता है कि बहुत बार शादी एक रिश्ते के तौर पर मानवीय और सामाजिक तौर पर टूट जाती है लेकिन न्यायिक आधार न होने के कारन चलती जाती है ,ऐसे व्यक्ति को एक मृत विवाह से छुटकारा दिलाने के लिए इस धारा के अंतर्गत तलाक का अधिकार होना चाहिए .

इस प्रस्ताव के अनुसार :

अगर पति इस धारा  में तलाक के लिए अर्जी दे तो पत्नी को विरोध का अधिकार है लेकिन अगर पत्नी इस धारा   में तलाक मांगे तो पति को विरोध करने का अधिकार नहीं होगा . पत्नी  अगर कहे कि इस तलाक के कारन उसको आर्थिक तंगी होगी तो जब तक पत्नी कि संतुष्टि के मुताबिक  आर्थिक सुरक्षा प्रदान नहीं कर देता तब तक पत्नी  विरोध कर सकती है .

पत्नी के साथ साथ बच्चों के लिए भी आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना पति के लिए जरूरी है .

पति कि घरेलु संपत्ति चाहे वोह शादी से पहले अर्जित कि गयी हो या शादी के बाद पति पत्नी में आधी आधी बाँट दी जायेगी .

यानी पति अपना आधा घर देगा ,पत्नी और बच्चों को आर्थिक सहायता देगा  और जो भी देगा वोह पत्नी की संतुष्टि अनुसार देगा और एक मृत विवाह से छुटकारा पायेगा .

अगर पत्नी तलाक मांगे तो पति को विवश हो कर तलाक देना ही पड़ेगा और साथ में अपनी संपत्ति भी देनी पड़ेगी . लड़ने का हक नहीं होगा .

पत्नी की संपत्ति के बारे में कोई बात नहीं लिखी गयी यानी बटवारा केवल पति की संपत्ति का होगा , पत्नी का इस्त्रिधन,पैत्रिक संपत्ति, निज संपत्ति पूर्णतः पत्नी के अधिकार में ही रहे गी  और तलाक के वक़्त उसकी कोई बात नहीं होगी .

राज्य सभा में यह प्रस्ताव आया और माननीय अरुण जेटली जी  ने कहा  ‘ जिस देश में भी ऐसा कानून है वहां पत्नी के हक का ध्यान रखा जाता है इस लिए पत्नी का संपत्ति में अधिकार सुनिश्चित कर दिया जाए ‘ इस के जवाब में सरकार ने पचास प्रतिशत हिस्सा पत्नी को देने का निर्णय लिया .

दुःख की बात है कि किसी को भी यह नहीं दिखा कि पति को लड़ने का न्यायिक अधिकार ही नहीं है – क्या यह संविधान का अपमान नहीं, क्या यह पति के मौलिक अधिकार का हनन नहीं  ?

जेटली जी के इस ब्यान के बाद मैंने अलग अलग देशों के तलाक ( जहाँ पर इस धारा में तलाक दिया जाता है ) कानून पढ़े अगर हमारे संसद सदस्य भी  पढते तो पाते कि जैसा कानून हम बना रहे है  ऐसा  तो विश्व के किसी देश में नहीं है .

हमारे प्रचलित कानून के अनुसार वैवाहिक संपत्ति कि परिभाषा विदेशी परिभाषा से बहुत अलग है . दुनिया के किसी भी देश में इस्त्रिधन की अवधारणा नहीं है .

अधिकाँश देशों में शादी कितने वर्ष चली इस बात को आधार ले कर संपत्ति का बटवारा होता है , तीन महीने चली शादी में पत्नी को बीस साल चली शादी वाले हक नहीं मिलते .

पति और पत्नी द्वारा शादी से ले कर तलाक तक अर्जित कि गयी संपत्ति का बटवारा होता है – पैत्रिक,वसीयत में मिली  संपत्ति का नहीं.

विश्व में कही भी ऐसा कानून नहीं है जिस में पति को तलाक का विरोध करने का हक नहीं है .

विश्व में कहीं भी ऐसा कानून नहीं है जहाँ केवल पति की संपत्ति का बटवारा हो और पत्नी कि संपूर्ण संपत्ति पत्नी की ही रहे .

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लगभग आधी शताब्दी पहले बना हुआ कानून जब संशोधित हो तो कम से कम वो आज के सामाजिक ढाँचे के अनुसार हो . पचास वर्ष पहले महिलायें पुरुषों से कई मामलों में पीछे थी , पड़ी लिखी कम थी ,आत्मनिर्भर नहीं थीं, आज महिलायें पुरुषों से शैक्षिक या आर्थिक आधार पर कहीं भी कमतर नहीं हैं ,बराबर पड़ती हैं,बराबर कमाती हैं फिर भी पति से गुजारा भत्ता हक समझ कर मांगती हैं ,

कानून  क़ी नयी परिभाषा बनाते वक़्त अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट क़ी इस टिपण्णी को भी ध्यान में रखा जाता क़ी आज क़ी तिथि में महिलाए गुजारा भत्ता कानून का दुरूपयोग करती हैं तो शायद अच्छा होता  .

अगर इस बात को भी ध्यान में रखा जाता कि दहेज़ कानून की आड़ में पतियों कि प्रताड़ना होती है तो भी शायद एक और ऐसा कानून जिस का दुरूपयोग होने की संभावना है को बनवाने की कोशिश न की जाती .

सब से बड़ा प्रश्न जो हमारे सामने मूह फाड़ कर खड़ा है : अगर कोई पुरुष अपनी क्रूर पत्नी से तलाक मांगता है को क्या उस क्रूर पत्नी को इनाम के तौर पर पति कि आधी संपत्ति दी जानी चाहिए ?

क्या पीड़ित न्यायालय जा कर अपनी जान की सुरक्षा लुट कर करे गा या उत्पीडन करने वाली पत्नी न्यायालय  से अपने दुष्कर्म का इनाम ले कर आये गी ?

कानून न तो रोज़ बनते हैं न हे जल्दी संशोधित होते हैं लेकिन अगर हम जल्दबाजी में ऐसा कानून बनवा लें जिस पर हम कल माथा पीटें तो इसका क्या फायदा .

स्टार टीवी पर एक प्रोग्राम देख रहा था जिस में महिला नेत्रियों द्वारा कहा गया वाक्य ” पति तलाक देने से पहले सौ बार सोचे ” ने मजबूर कर दिया यह सब कुछ लिखने के लिए . यह वाक्य बताता है कि किस भावना से यह कानून परिभाषित किया जा रहा है , law commission और सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्ताव दिया की मृत शादी में से व्यक्ति को निकाला जाए ताकि उसको चैन से जीने का हक मिले और इस प्रस्ताव की आड़ में ऐसा कानून बनवाया जा रहा है  जो इसके विपरीत है .

आप भी इस को देख सकते हैं  :

यह ना समझें कि मैं पुरुष अधिकारों की बात कर रहा हूँ , मैं तो सिर्फ नागरिक और संवेधानिक अधिकारों क़ी बात कर रहा हूँ

हमारे बच्चे इन्ही कानूनों के अंतर्गत रहते हुए अपना जीवन जियेंगे , ऐसा न हो कल आप का बेटा भाई अपनी पत्नी की क्रूरता का शिकार हो और उसी क्रूर पत्नी को अपने जीवन भर के कमाई दे कर छुटकारा पाए और आप कहें ‘ चल बेटा जान तो बची, गरीबी में गुज़ारा कर ले ,क्या करें कानून ही ऐसा है ”

क्या इस कानून से समाज का भला होगा ?

पीड़ित को न्याय मिले और पीड़ा देने वाले को सजा , सामाजिक न्याय का यही मतलब है . पीड़ित को सशक्त करें , पीड़ा देने वाले को नहीं .

 

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